Internet Ki Upyogita Essay In Hindi

विद्यार्थी जीवन में इंटरनेट (Internet) का बहुत महत्व है, इंटरनेट (Internet) अनंत संभावनाओं का साधन है जो आपको घर बैठै ही उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त करने में आपकी सहायता कर सकता है, कंप्यूटरइस शताब्दी के प्रमुख आविष्कारों में से एक है और इंटरनेट (Internet) के साथ यह और भी ताकतवर बन जाता है आईये जानते हैं विद्यार्थी जीवन में इंटरनेट का महत्व - Vidyarthi Jeevan Me Internet Ka Mahatva

निबंध - विद्यार्थी जीवन में इंटरनेट का महत्व Nibandh- Vidyarthi Jeevan Me Internet Ka Mahatva

आधुनिक शिक्षा में इंटरनेट का रोल अहम है आप मिनटों में इंटरनेट पर गूगल की सहायता से कोई भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, आप कंप्‍यूटर सीख सकते हैं, अगर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं इससे पढाई करने वाले बच्चों को बहुत मदद मिलती है। आप घर बैठे यू्ट्यूब पर वीडियो देखकर कुछ भी बनाना सीख सकते हैं।

Google Classroom जैसे कई इंटरनेट प्राेग्राम है जिसके माध्‍यम से स्टूडेंट और टीचर्स ऑनलाइन मिल सकते हैंं क्‍लासरूम ऐप की मदद से न केवल होमवर्क का रिकॉर्ड रखा जा सकेगा, बल्कि इससे असाइनमेंट की तस्‍वीरें भी खींची जा सकती हैं। इसकी मदद से आप ड्राइंग या प्रोजेक्‍ट वर्क को पीडीएफ फॉरमेट में भी शेयर कर सकते हैं

अगर कोई ऐसा विषय है जिसके टीचर आपके शहर में नहीं हैं तो ऐसे कई बेवसाइट है जहां आप अपनी पंसद के टीचर से मनपसंद विषय पढ सकते हैं, इंटरनेट पर ऐसे कई डिस्टेंस लर्निंग कोर्स उपलब्‍ध है जिन्‍हें आप घर बैठे ही कर सकते हैं सर्टिफिकेट भी प्राप्‍त कर सकते हैं 

विद्यार्थी इंटरनेट का भरपूर लाभ उठा सकते हैं, अगर कोई विषय पढकर समझ नहीं आ रहा है तो आप यूट्यूब पर उसका वीडियो देखकर भी समझ सकते हैं, इंटरनेट एक प्रकार से विद्यार्थीयों के लिये स्‍मार्टक्‍लास का काम कर सकता है

फिलहाल विद्यार्थीयों पास इंटरनेट का पावर है, जिससे विद्यार्थी कुछ भी कर सकते हैं, पलभर में कोई भी जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैंं। 

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तीसरी तकनीकी क्रांति (1980) के बाद इंटरनेट सूचनाओं के आदान-प्रदान का सबसे सुलभ साधन बन चुका है। इसने मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी है। एक अरब सत्ताईस करोड़ आबादी वाले देश में हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। देश की सत्तर प्रतिशत से अधिक आबादी इसी भाषा में अपने को अभिव्यक्त करती है। आज ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, गुयाना, मारीशस, सूरीनाम, फीजी, नीदरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, त्रिनिदाद और टोबैको जैसे देशों में हिंदी बोलने वाले काफी तादाद में रहते हैं जो हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए काफी संतोषजनक बात है।

इसके साथ ही विकसित देशों में भी हिंदी को लेकर ललक बढ़ रही है। कारण यह है कि किसी भी बहुराष्ट्रीय कंपनी या देश को अपना उत्पाद बेचने के लिए आम आदमी तक पहुंचना होगा और इसके लिए जनभाषा ही सबसे सशक्त माध्यम है। यही कारक हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहायक सिद्ध हो रहा है। आज पचास से अधिक देशों के पांच सौ से अधिक केंद्रों पर हिंदी पढ़ाई जाती है। कई केंद्रों पर स्नातकोत्तर स्तर पर हिंदी के अध्ययन-अध्यापन के साथ ही पीएचडी करने की सुविधा उपलब्ध है। विश्व के लगभग एक सौ चालीस देशों तक हिंदी किसी न किसी रूप में पहुंच चुकी है। आज हिंदी के माध्यम से संपूर्ण विश्व भारतीय संस्कृति को आत्मसात कर रहा है।

जब सन 2000 में हिंदी का पहला वेबपोर्टल अस्तित्त्व में आया तभी से इंटरनेट पर हिंदी ने अपनी छाप छोड़नी प्रारंभ कर दी जो अब रफ्तार पकड़ चुकी है। नई पीढ़ी के साथ-साथ पुरानी पीढ़ी ने भी इसकी उपयोगिता समझ ली है। मुक्तिबोध, त्रिलोचन जैसे हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवि प्रकाशकों द्वारा उपेक्षित रहे। इंटरनेट ने हिंदी को प्रकाशकों के चंगुल से मुक्त कराने का भी भरकस प्रयास किया है। इंटरनेट पर हिंदी का सफर रोमन लिपि से प्रारंभ होता है और फॉन्ट जैसी समस्याओं से जूझते हुए धीरे-धीरे यह देवनागरी लिपि तक पहुंच जाता है। यूनीकोड, मंगल जैसे यूनीवर्सल फॉन्टों ने देवनागरी लिपि को कंप्यूटर पर नया जीवन प्रदान किया है। आज इंटरनेट पर हिंदी साहित्य से संबंधित लगभग सत्तर ई-पत्रिकाएं देवनागरी लिपि में उपलब्ध हैं।

संयुक्त अरब अमीरात में रहने वाली प्रवासी भारतीय साहित्यप्रेमी पूर्णिमा बर्मन ‘अभिव्यक्ति’ और ‘अनुभूति’ नामक ई-पत्रिका की संपादकहैं और 1996 से ‘प्रतिबिंब’ नामक नाट्य संस्था चला रही हैं। ‘अभिव्यक्ति’ हिंदी की पहली ई-पत्रिका है जिसके आज तीस हजार से भी अधिक पाठक हैं। ‘अभिव्यक्ति’ के बाद ‘अनुभूति’, ‘रचनाकार’, ‘हिंदी नेस्ट’, ‘कविताकोश’, ‘संवाद’ आदि ई-पत्रिकाएं इंटरनेट पर अपनी छटा बिखेर रही हैं। इनकी बढ़ती पैठसे घबरा कर हिंदी के अनेक प्रकाशकों-संपादकों ने अपनी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के ई-संस्करण जारी किए। फलस्वरूप आज ‘हंस’, ‘कथादेश’, ‘तद््भव’, ‘नया ज्ञानोदय’ जैसी न जाने कितनी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएं इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। यही नहीं, आज जितने भी प्रतिष्ठित अखबार हैं, सभी के ई-संस्करण मौजूद हैं। हम दुनिया के किसी भी कोने में रह कर क्षेत्रीय संस्करण के अखबारों को पढ़ कर अपने क्षेत्र विशेष की जानकारी हिंदी में भी ले सकते हैं।

आजकल स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए ब्लॉग एक महत्त्वपूर्ण साधन बन चुका है जो हर समय सुगमता से ब्लागर और पाठक दोनों के लिए उपलब्ध है। आलोक कुमार हिंदी के पहले ब्लागर हैं जिन्होंने ब्लाग ‘नौ-दो-ग्यारह’ बनाया। आज हिंदी में ब्लॉगों की संख्या एक लाख के ऊपर पहुंच चुकी है। इनमें से लगभग दस हजार अतिसक्रिय और बीस हजार सक्रिय की श्रेणी में आते हैं। आलोक कुमार ने ही इंटरनेट पर पहली बार ‘चिट्ठा’ शब्द का इस्तेमाल किया जो अब ख्याति प्राप्त कर चुका है। आज के दैनिक समाचार पत्रों के ई-संस्करण पाठकों के लिए वरदान साबित हुए हैं क्योंकि कोई भी पाठक केवल एक या दो अखबार खरीद सकता है मगर समाचार पत्र इंटरनेट पर उपलब्ध होने से वह सभी को थोड़े खर्च में देख-पढ़ सकता है।

इंटरनेट पर हिंदी साहित्यिक सीमाओं को लांघ कर अपना प्रसार कर रही है, वह कहानी, नाटक, उपन्यास से आगे बढ़ कर महापुरुषों की जीवनियों, चिकित्सा, विज्ञान के क्षेत्र में विश्व की अन्य भाषाओं से कदमताल कर रही है। इसके साथ ही प्रकाशकों ने अपनी-अपनी वेबसाइट बना रखी हैं जिन पर अनेक रचनाकारों की महत्त्वपूर्ण पुस्तकें पाठकों को घर बैठे मिल जाती हैं। हिंदी पुस्तकों के ई-संस्करण से पाठकों को यह सुविधा उपलब्ध है कि वे अपने काम और रुचि के अनुसार पुस्तकों का चुनाव कर सकते हैं।

इस संबंध में अभी तक सबसे सराहनीय प्रयास महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा) ने किया है। इसकी वेबसाइट डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट हिंदीसमय डॉट कॉम पर हिंदी के लगभग एक हजार रचनाकारों की रचनाओं का अध्ययन किया जा सकता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, श्यामसुंदर दास आदि की ग्रंथावलियों के साथ-साथ समकालीन रचनाकारों की रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया गया है। कह सकते हैं कि वर्धा विश्वविद्यालय ने हिंदीप्रेमियों, शिक्षकों, शोधार्थियों को एक चलता-फिरता पुस्तकालय मुहैया कराया है जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। इसके साथ ही भारत के अनेक विश्वविद्यालयों ने भी हिंदी को सर्वजन सुलभ बनाने के लिए छोटे-मोटे प्रयास किए हैं।

आज सभी आवश्यक वेबसाइटों के हिंदी संस्करण मौजूद हैं। पूंजी बाजार नियामक सेबी, बीएसई, एनएसई, भारतीय जीवन बीमा निगम, भारतीय स्टेट बैंक, रिजर्व बैंक आफ इंडिया, यूनाइटेड बैंक आफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, भारतीय लघु विकास उद्योग बैंक की वेबसाइटें हिंदी में भी उपलब्ध हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की वेबसाइट भी हिंदी में है। जुलाई 2009 में दिया गया रिजर्व बैंक का यह निर्देश महत्त्वपूर्ण है कि हिंदी में लिखे पत्रों का जवाब हिंदी में दिया जाना चाहिए। सभी राष्ट्रीयकृत बैंकों में हिंदी अधिकारी और अनुवादकरखे जाने का निर्देश रिजर्व बैंक ने जारी कर रखा है।

राजभाषा अधिनियम 1976(5) के तहत केंद्र सरकार ने ‘क’ क्षेत्र के अंतर्गत (बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, दिल्ली और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह) आने वाले सभी सरकारी उपक्रमों में हिंदी को प्रथम भाषा के रूप में अनिवार्य कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों, बैंकों आदि ने अपनी वेबसाइटों के अंगरेजी के साथ-साथ हिंदी संस्करण भी चला रखे हैं। हिंदी में काम बढ़ेगा तो हिंदी जानने वालों को आजीविका के अधिक अवसर प्राप्त होंगे और हिंदी के प्रति उनकी रुचि बढ़ेगी।

आज हिंदी के पंद्रह से भी अधिक सर्च इंजन हैं जो किसी भी वेबसाइट का चंद मिनटों में हिंदी अनुवाद करके पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर देते हैं। याहू, गूगल और फेसबुक भी हिंदी में उपलब्ध हैं। अब कंप्यूटर से निकल कर हिंदी मोबाइल में न केवल पहुंच चुकी है बल्कि भारी संख्या में लोग इसका उपयोग भी कर रहे हैं। मोबाइल तक हिंदी की पहुंच ने देश में देवनागरी लिपि के समक्ष खड़ी चुनौती को काफी हद तक मिटा दिया है।

आज से पंद्रह साल पहले जब हम हिंदी के भविष्य पर विचार करते थे तो अनेक लोग कहते थे कि हिंदी का भविष्य तो उज्ज्वल है लेकिन हमारी लिपि पर बड़ा संकट मंडरा रहा है- चूंकि मोबाइल प्रयोक्ता अपने संदेश भेजने के लिए रोमन लिपि पर निर्भर रहते थे। आज यह समस्या हल हो चुकी है। अगर आपके भीतर थोड़ी इच्छाशक्ति है और अपनी मातृभाषा के लिए सम्मान भी, तो आप अपनी भावना हिंदी में व्यक्त कर सकते हैं। चाहे वह कंप्यूटर पर हो या मोबाइल पर।

हिंदी के लिए उत्साहजनक बात इंटरनेट पर आई ट्वीटरों की बाढ़ भी है जिस पर हिंदी का जबर्दस्त प्रयोग हो रहा है। प्रोफेसर, डॉक्टर, राजनेता, अभिनेता, सामाजिक कार्यकर्ता, खिलाड़ी आदि सभी ट्वीटर का प्रयोग कर रहे हैं। इनका अनुसरण अन्य लोग करते हैं। यह अनुप्रयोग हिंदी के लिए नई संभावनाएं पैदा करेगा।

हाल ही में हिंदी के इस्तेमाल के दो और नए स्थान देखने को मिले हैं जिन पर आज से पांच साल पहले सोचा भी नहीं जा सकता था। डीटीएच और क्रिकेट के स्कोर बोर्ड हमारे सामने हिंदी को नए रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। डीटीएच ने किसी भी चैनल के हिंदी में अनुवाद की सुविधा दे रखी है। हम जानते हैं कि भारत की अधिकतर आबादी हिंदी में ही अपने विचारों का आदान-प्रदान करती है।

भले अंगरेजी आती हो लेकिन हिंदी या स्थानीय भाषाओं को हम जिस सहज भाव से आत्मसात करते हैं उस भाव से अंगरेजी को नहीं, चूंकि हिंदी या हमारी प्रादेशिक भाषाएं हमारे अंत:करण में विद्यमान हैं। पहले क्रिकेट की हिंदी में कमेंट्री निश्चित समय तक ही होती थी, लेकिन अब पूरा खेल हम हिंदी में सुन सकते हैं। इसके साथ ही डिसकवरी, नेशनल ज्योग्राफिकल और एनीमल प्लानेट जैसे चैनल हिंदी के दर्शकों का ज्ञानवर्द्धन कर रहे हैं।

आने वाला समय हिंदी का है। बस कुछ दकियानूसी और अदूरदर्शी सोच वाले ही हिंदी के प्रति नकारात्मक भाव व्यक्त कर रहे हैं। आज के समय में न तो हिंदी की सामग्री की कमी है और न ही पाठकों की। हां, विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में अभी और अधिक कार्य करने की आवश्यकता है जिससे इसका पूर्ण लाभ आम आदमी को मिल सके। हिंदी का एक मजबूत पक्ष यह भी है कि यह बाजार की भाषा बन चुकी है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी उपयोगिता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने के लिए अपने कदम बढ़ा चुकी है, बस आवश्यकता मजबूत इच्छाशक्ति की है।

(धर्मेंद्र प्रताप सिंह)

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